ट्रंप की धमकियों और युद्ध से दुनिया में अनिश्चितता, घरेलू मांग बढ़ाने के उपाय तय करेंगे भारत के विकास की दिशा - KRANTIKARI SAMVAD

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Wednesday, December 18, 2024

ट्रंप की धमकियों और युद्ध से दुनिया में अनिश्चितता, घरेलू मांग बढ़ाने के उपाय तय करेंगे भारत के विकास की दिशा

 


ट्रंप की धमकियों और युद्ध से दुनिया में अनिश्चितता, घरेलू मांग बढ़ाने के उपाय तय करेंगे भारत के विकास की दिशा



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ट्रंप की धमकियों और युद्ध से दुनिया में अनिश्चितता, घरेलू मांग बढ़ाने के उपाय तय करेंगे भारत के विकास की दिशा

सकारात्मक इंडिकेटर्स देखें तो शेयर बाजार सितंबर के रिकॉर्ड स्तर से 6% नीचे हैं लेकिन जनवरी से अब तक इसमें 12% ग्रोथ है। सोना-चांदी के भाव भी रिकॉर्ड ऊंचाई से फिसलने के बावजूद इस वर्ष 30% अधिक हैं। रुपया 2% कमजोर हुआ है लेकिन विदेशी मुद्रा भंडार दिसंबर 2023 के अंत से इस वर्ष नवंबर तक 35 अरब डॉलर बढ़ा है। सितंबर तक इक्विटी एफडीआई में 45% वृद्धि हुई है।

 वर्ष 2024 जाते-जाते कई अनिश्चितताएं खड़ी करता जा रहा है। सबसे बड़ी अनिश्चितता अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति चुनाव जीतने से पैदा हुई है। ट्रंप हर देश के आयात पर टैरिफ लगाने या बढ़ाने से लेकर नाटो से अलग होने और यूक्रेन को मदद घटाने तक की चेतावनी दे चुके हैं। अगर वे अपनी बात पर कायम रहे तो संभव है एक नई विश्व व्यवस्था खड़ी हो। इस भू-राजनीतिक अस्थिरता के बीच विश्व अर्थव्यवस्था का सकारात्मक पक्ष देखें तो 2024 में सॉफ्ट लैंडिंग का जो डर था, वह नहीं हुआ। दुनिया मंदी में नहीं गई, भले ही कुछ बड़े देशों की विकास दर कम हुई हो। प्रमुख देशों में महंगाई दर भी नीचे आई है।


वैश्विक अस्थिरता का असर भारत पर भी दिखा है। यहां विकास दर लगातार तीन तिमाही से घट रही है। जुलाई-सितंबर 2024 में विकास दर सात तिमाही में सबसे नीचे (5.4%) पहुंच गई। दो साल तक ब्याज दर ऊंची रहने के बावजूद महंगाई सिर उठाए है। ऊंची ब्याज दर और महंगाई दोनों मांग बढ़ाने में बाधक हैं। बैंक कर्ज, एफएमसीजी की बिक्री, ऑटोमोबाइल की बिक्री जैसे इकोनॉमी में मांग को बताने वाले ज्यादातर इंडिकेटर की गति धीमी हुई है। नवंबर में कारों की बिक्री 14% गिरी है। घरेलू के अलावा मांग का दूसरा रास्ता निर्यात है, लेकिन उस मोर्चे पर भी मायूसी है। अप्रैल से नवंबर तक वस्तु निर्यात सिर्फ 2.17% बढ़ा है। इन वजहों से मैन्युफैक्चरिंग में ग्रोथ भी दूसरी तिमाही में 2.2% रह गई। मांग बढ़ाने का एक और उपाय सरकारी खर्च है। विशेषज्ञ चुनावों के कारण इसमें कमी को भी धीमी ग्रोथ की वजह मानते हैं।

सकारात्मक इंडिकेटर्स को देखें तो भारतीय शेयर बाजार सितंबर के रिकॉर्ड स्तर से 6% नीचे हैं, लेकिन जनवरी से अब तक इसमें 12% ग्रोथ है। सोना-चांदी के भाव भी रिकॉर्ड ऊंचाई से फिसलने के बावजूद इस वर्ष 30% अधिक हैं। रुपया 2% कमजोर हुआ है, लेकिन विदेशी मुद्रा भंडार दिसंबर 2023 के अंत से इस वर्ष नवंबर तक 35 अरब डॉलर बढ़ा है। अप्रैल से सितंबर तक इक्विटी एफडीआई में 45% वृद्धि हुई है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का ग्रॉस एनपीए घटकर 3% रह गया है। यानी वे नया कर्ज देने की स्थिति में हैं। रियल एस्टेट में निवेश और कॉमर्शियल स्पेस की मांग में इस साल नया रिकॉर्ड बना। ग्लोबल कैपेसिटी सेंटर (जीसीसी) सबसे ज्यादा जगह ले रहे हैं। हालांकि इस वर्ष घरों के दाम औसतन 32% बढ़ने के कारण बिक्री 2% ही बढ़ी। अगले वर्ष कीमतों में स्थिरता की उम्मीद है।

आने वाले वर्ष के लिए विशेषज्ञ मानते हैं कि आर्थिक गतिविधियों में सुस्ती दूसरी तिमाही में निचले स्तर पर पहुंच चुकी है, आगे विकास दर बढ़ेगी। त्योहारी मांग और ग्रामीण इलाकों में आर्थिक गतिविधियों में तेजी के कारण रिकवरी शुरू भी हो चुकी है। दूसरी छमाही में सरकारी खर्चों में बढ़ोतरी का असर भी दिखेगा। ट्रंप 20 जनवरी को राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के बाद क्या करेंगे, यह अभी स्पष्ट नहीं है। इलेक्ट्रॉनिक्स के बाद बांग्लादेश में बिगड़े हालात के कारण भारत के टेक्सटाइल निर्यात में अच्छी ग्रोथ दिख रही है, लेकिन ऐसा हर क्षेत्र में नहीं है।

विकास का मोमेंटम बरकरार रखने के लिए विशेषज्ञ घरेलू मांग बढ़ाना जरूरी मानते हैं। उनका कहना है कि इसके लिए रोजगार बढ़ाना होगा। मौजूदा वित्त वर्ष के पहले आठ महीने में से पांच महीने बेरोजगारी दर 8% या उससे अधिक रही है। एंप्लॉयबिलिटी बढ़ाने के लिए विशेषज्ञ ऐसी स्किल हासिल करने का सुझाव देते हैं जिनकी मांग है, क्योंकि बहुत से ऐसे क्षेत्र हैं जहां डिमांड की तुलना में कुशल प्रोफेशनल मिल नहीं रहे हैं। घरेलू और वैश्विक परिस्थितियों के आधार पर विभिन्न संस्थाओं ने अगले वर्ष भारत की विकास दर 6.3% से 6.5% तक रहने का अनुमान लगाया है। यह मौजूदा वर्ष से कम होने के बावजूद बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे अधिक होगा।
भारत पर ट्रंप का असर

ट्रंप ने अपने पड़ोसी देशों कनाडा और मैक्सिको से आयात पर 25%, चीन पर 60% और अन्य देशों से आयात पर 20% तक टैरिफ लगाने की चेतावनी दी है। जेएनयू के प्रोफेसर (रिटायर्ड) और अर्थशास्त्री अरुण कुमार जागरण प्राइम से कहते हैं, “ट्रंप के साथ अनिश्चितता का दौर आ गया है। ट्रंप ने टैरिफ लगाने की जो बात कही है उससे सप्लाई की चुनौतियां बहुत बढ़ जाएंगी। तब अपने आप को बचाने के लिए हर देश टैरिफ लगाएगा। अनिश्चितता से ग्रोथ रुकेगी और महंगाई बढ़ेगी।”

दरअसल, अमेरिका की इकोनॉमी विश्व अर्थव्यवस्था का लगभग एक-चौथाई है। वह ज्यादातर देशों से आयात करता है। सभी देशों से आयात पर टैरिफ बढ़ा तो ग्लोबल सप्लाई चेन प्रभावित होगी, जिसका असर विश्व व्यापार पर पड़ने की संभावना है। इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे सेक्टर की सप्लाई चेन तो कई देशों से जुड़ी होती है।

हालांकि एसबीआई रिसर्च का कहना है कि ट्रंप की जीत भारत के लिए चुनौतियों के साथ अवसर भी लाएगी। बढ़े हुए टैरिफ, H-1B वीजा पर अंकुश और मजबूत डॉलर से कुछ समय के लिए अस्थिरता आ सकती है, लेकिन लंबे समय में मैन्युफैक्चरिंग को विस्तार देने, निर्यात बाजार को विविध बनाने और आर्थिक आत्मनिर्भरता बढ़ाने में मदद मिलेगी। बैंकों की स्थिति मजबूत हुई है, इसलिए वे झटकों को सहन करने में सक्षम होंगे। फेडरल रिजर्व के नरम रुख के कारण क्रॉस बॉर्डर पूंजी प्रवाह और डॉलर की लिक्विडिटी सुलभ रहेगी।

ट्रंप ने पहले कार्यकाल में भारत का जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रेफरेंसेज (GSP) दर्जा खत्म कर दिया था, जो अभी तक बहाल नहीं हुआ है। लेकिन कमोडिटी के हिसाब से विश्लेषण से पता चलता है कि कुछ वस्तुओं के निर्यात में वृद्धि हुई और भारत ने चीन पर तुलनात्मक लाभ हासिल किया है। इनमें फुटवियर, खनिज, रसायन और इलेक्ट्रिकल सामान तथा मशीनरी शामिल हैं। वर्ष 2022-23 में अमेरिका को फुटवियर निर्यात 8% और मिनरल्स का 33% बढ़ा। संभावना है कि ट्रंप 2.0 के दौरान भी भारत को चीन पर तुलनात्मक लाभ मिलेगा। ग्लोबल सप्लाई चेन में बदलाव से फार्मास्यूटिकल्स, टेक्सटाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे सेक्टर को भी लाभ मिलने की संभावना है।

एसबीआई का कहना है कि ट्रंप 1.0 के दौरान डॉलर की तुलना में रुपया 11% गिरा था। यह बाइडेन के समय हुई गिरावट (लगभग 14%) से कम है। फिर भी ट्रंप 2.0 के दौरान रुपये में 8-10% की गिरावट हो सकती है। अनुमान है कि रुपये में 5% गिरावट से महंगाई में 0.25-0.30 प्रतिशत का इजाफा होगा।
विकास के अनुमान

शीर्ष उद्योग चैंबर CII की चीफ इकोनॉमिस्ट बिदिशा गांगुली जागरण प्राइम से कहती हैं, “वर्ष 2024-25 की पहली छमाही में ग्रोथ रेट पिछले साल के 8.2% की तुलना में 6.0% रही है। इसका कारण कोई ढांचागत समस्या नहीं, बल्कि यह अस्थायी है। चुनावों के कारण सरकार ने पूंजीगत खर्च कम किया, जिससे निवेश गतिविधियां धीमी हुईं। ब्याज दर भी लगभग दो साल से ऊंची बनी हुई है। मानसून के असमान पैटर्न से महंगाई बढ़ी तो उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति कम हुई। इसका असर खास तौर से शहरी इलाकों में मांग पर पड़ा।”

प्रो. अरुण कुमार मांग बढ़ाने के लिए असंगठित क्षेत्र को भी साथ लेने की जरूरत बताते हैं, “हमारा असंगठित क्षेत्र गिरावट की ओर है। उसी की वजह से असमानता बढ़ रही है। यह दोहरा ट्रैप है। असंगठित क्षेत्र में ही 94% लोग काम करते हैं, जिनकी आय घट रही है। इसकी वजह से मांग पर जो असर पड़ता है, उससे संगठित क्षेत्र की मांग प्रभावित होती है।”

कंपनियों के रेवेन्यू से मांग का पता चलता है। एसबीआई रिसर्च के अनुसार, जुलाई-सितंबर 2024 तिमाही में प्रमुख 3000 लिस्टेड कंपनियों (फाइनेंस और बीमा को छोड़) का रेवेन्यू सिर्फ 3.9% बढ़ा। इनका एबिटा दो तिमाही से निगेटिव बना हुआ है। वित्त वर्ष 2021-22 की दूसरी तिमाही में इन कंपनियों का रेवेन्यू 38% बढ़ा था। तब से 2022-23 की तीसरी तिमाही (15%) तक इसमें ग्रोथ दहाई अंकों में रही। पिछली छह तिमाही से इनके रेवेन्यू में (-)2% से लेकर 5.7% तक की ही वृद्धि हुई है। दूसरी तिमाही में ग्रामीण क्षेत्र में निजी खर्च एक साल पहले की तुलना में 10% बढ़ा है। पिछली कई तिमाही से ग्रामीण खर्च में लगातार वृद्धि मांग बढ़ाने में मदद कर रही है।

सितंबर तिमाही के जीडीपी आंकड़े आने के बाद आरबीआई ने इस वर्ष ग्रोथ का अनुमान 7.2% से घटाकर 6.6% कर दिया है। दूसरी संस्थाओं का अनुमान 6.3% से 7% तक का है। अगले वर्ष के लिए विकास का अनुमान 6.5% से 6.7% है। आरबीआई ने इस वर्ष तीसरी तिमाही में 6.8%, चौथी में 7.2%, अगले वर्ष पहली तिमाही में 6.9% और दूसरी तिमाही में 7.3% ग्रोथ का अनुमान जताया है।

बिदिशा कहती हैं, “आरबीआई की फरवरी की समीक्षा से ब्याज दर कम होने की उम्मीद है। इस तरह देखें तो मौजूदा वित्त वर्ष में भारत 6.5-7.0% विकास दर के रास्ते पर है। यह पिछले साल के 8.2% की तुलना में कम जरूर है, लेकिन यह सस्टेनेबल ग्रोथ की तरफ ट्रांजिशन को दिखाता है। महामारी के बाद निकली मांग में तेजी का दौर खत्म हो चुका है और अब अर्थव्यवस्था दीर्घकालिक संभावना के करीब बढ़ रही है।” उनका मानना है कि सरकार भी दूसरी छमाही में खर्च बढ़ाएगी।

एसबीआई के अनुसार, मौजूदा वित्त वर्ष की पहली छमाही में केंद्र सरकार का पूंजीगत खर्च पूरे वर्ष के बजट अनुमान का केवल 37.3% है। वित्त वर्ष 2018-19 से 2023-24 तक का औसत देखें तो पहली छमाही में सरकार ने बजट अनुमान का 47% खर्च किया था। राज्यों की स्थिति और गंभीर है। 17 प्रमुख राज्यों में से केवल पांच में पहली छमाही में खर्च बढ़ा है।

वैश्विक विकास दर इस वर्ष 3.2% और अगले साल भी इसी के आसपास रहने की उम्मीद है। आईएमएफ ने अमेरिका की विकास दर इस वर्ष 2.8% और अगले वर्ष 2.2%, चीन की 4.8% और 4.5%, यूरोपियन यूनियन की 0.8% और 1.2%, इंग्लैंड की 1.1% और 1.5% तथा ब्राजील की 3.0% और 2.2% रहने का अनुमान जताया है।
ब्याज दर के साथ महंगाई भी ऊंची

ब्याज दर अधिक होने के साथ महंगाई की भी दर ऊंची बनी हुई है, जिससे मांग पर असर पड़ता है। खुदरा महंगाई जुलाई और अगस्त में 4% से नीचे रहने के बाद फिर बढ़ने लगी। अक्टूबर में यह 6% की आरबीआई की निर्धारित सीमा पार करने के बाद नवंबर में 5.48% रही है। नवंबर में खाद्य महंगाई 9.04% रही, जो अक्टूबर में 10.87% थी। पिछले एक साल का आंकड़ा देखें तो खाद्य महंगाई जुलाई और अगस्त में 6% से कम थी। बाकी महीनों में यह 8% से अधिक ही रही है।

प्रो. अरुण कुमार कहते हैं, “खाद्य महंगाई लोगों को ज्यादा प्रभावित कर रही है। गरीब वर्ग आमदनी का बड़ा हिस्सा खाने पर खर्च करता है। इसलिए महंगाई गरीबों को ही अधिक प्रभावित करती है। हमारा रुपया गिरता रहा तो महंगाई और बढ़ेगी।”

बिदिशा कहती हैं, “भारत में लगातार ऊंची महंगाई दर मुख्य रूप से खाद्य महंगाई के कारण है। खाद्य और ईंधन को छोड़कर बाकी चीजों की कोर महंगाई नवंबर में 3.64% रह गई, जो एक साल पहले 4.11% थी। लेकिन खाद्य महंगाई नवंबर 2023 के 8.7% की तुलना में पिछले महीने 9.04% रही है। ऊंची खाद्य महंगाई का मुख्य कारण सब्जियां हैं। विपरीत मौसम और सप्लाई चेन इन्फ्रास्ट्रक्चर में कमी के कारण इनकी सप्लाई बाधित होती है और दाम बढ़ते हैं।”

“हालांकि अब खाद्य महंगाई में कमी दिखने लगी है। अक्टूबर के 10.87% की तुलना में नवंबर में यह 9.04% रही है। इसलिए खुदरा महंगाई भी 6.21% से घटकर 5.48% पर आ गई। खरीफ फसलों की अच्छी उपज, रबी फसलों के बेहतर रहने की संभावना और पर्याप्त बफर स्टॉक के कारण यह ट्रेंड इस वर्ष की चौथी तिमाही में बने रहने की संभावना है।”

अमेरिका और यूरोप में ब्याज दरें बढ़ाने के बाद महंगाई नीचे आई और अब वहां ब्याज दरें घटाने का दौर शुरू हो चुका है। लेकिन भारत में करीब दो साल से रेपो रेट 6.5% पर रहने के बावजूद खुदरा महंगाई 5% से ऊपर है। इसका कारण पूछने पर प्रो. अरुण कुमार बताते हैं, “यूरोप और अमेरिका में महंगाई अलग है। वहां महंगाई इंडेक्स में फूड बास्केट बहुत छोटा होता है। इसलिए वहां ब्याज दर बढ़ाकर गैर-कृषि क्षेत्र में मांग कम करके महंगाई नीचे लाई जा सकती है।”

“भारत में महंगाई का कारण अलग है। यहां इसके बढ़ने के दो प्रमुख कारण हैं- ईंधन और खाद्य। आरबीआई के ब्याज दर घटाने या बढ़ाने से ईंधन या खाने-पीने की चीजों के दाम पर कोई असर नहीं पड़ता है। ब्याज दर बढ़ने से गैर-कृषि क्षेत्र में डिमांड कम हो सकती है, लेकिन महंगाई उसकी वजह से नहीं है। यह सप्लाई की दिक्कतों के कारण है।” उनका कहना है कि रिजर्व बैंक को ईंधन तथा खाद्य पदार्थों को छोड़कर कोर महंगाई पर ध्यान देना चाहिए। अगर रिजर्व बैंक कोर महंगाई को टारगेट करे तो वह ज्यादा प्रभावी होगा।

सीआईआई की बिदिशा भी कहती हैं, “खाद्य महंगाई को मौद्रिक नीति के जरिए नीचे नहीं लाया जा सकता। मध्यम और लंबी अवधि में इसे कम करने के लिए सप्लाई सुधारने की जरूरत है। सिंचाई में निवेश और जलवायु-सहिष्णु फसलों के जरिए कृषि उत्पादकता बढ़ाने, स्टोरेज इन्फ्रास्ट्रक्चर मजबूत करने, प्रिसीजन खेती और अन्य एडवांस टेक्नोलॉजी को अपनाने, कृषि बाजार सुधारों को प्रमोट करने और कृषि में निजी निवेश प्रोत्साहित करने जैसे कदम इसमें लाभदायक हो सकते हैं।”
बैंक कर्ज में वृद्धि धीमी, राइट ऑफ से एनपीए कम

आरबीआई के अनुसार अप्रैल से अक्टूबर तक कुल बैंक कर्ज में वृद्धि दर आधी से भी कम रह गई है। पिछले वर्ष इन सात महीनों में कुल बैंक कर्ज 13% और नॉन-फूड कर्ज 13.1% बढ़ा था। इस वर्ष दोनों में सिर्फ 4.9% वृद्धि हुई है। कृषि कर्ज वृद्धि दर 10.6% से घटकर 6.5%, इंडस्ट्री को कर्ज 3.9% की तुलना में 3.3%, सर्विस सेक्टर को 14.2% की तुलना में 4.2% और पर्सनल लोन (ड्यूरेबल, होम, ऑटो, क्रेडिट कार्ड, शिक्षा) 19.6% की तुलना में सिर्फ 5.9% बढ़ा है।

वित्त राज्यमंत्री पंकज चौधरी ने आरबीआई के प्रोविजनल आंकड़ों के हवाले से राज्यसभा में बताया कि सितंबर 2024 के अंत में सरकारी बैंकों का ग्रॉस एनपीए 3.16 लाख करोड़ रुपये था, जो उनके कुल कर्ज का 3.09% है। निजी क्षेत्र के बैंकों का एनपीए 1.86% है।

आरबीआई की जून में जारी फाइनेंशियल स्टैबिलिटी रिपोर्ट के अनुसार मार्च 2024 में सभी बैंकों का ग्रॉस एनपीए 2.8% और नेट एनपीए 0.6% रह गया था। इसके मार्च 2025 तक 2.5% रह जाने का अनुमान है। सरकारी बैंकों का ग्रॉस एनपीए 3.7%, निजी बैंकों का 1.8% और विदेशी बैंकों का 1.2% था। आर्थिक परिस्थितियां खऱाब हुईं तो सभी बैंकों का ग्रॉस एनपीए बढ़कर 3.4% हो सकता है। तब सरकारी बैंकों का एनपीए 4.1%, निजी का 2.8% और विदेशी बैंकों का 1.3% तक जा सकता है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का ग्रॉस एनपीए मार्च 2015 में 4.97% और मार्च 2018 में रिकॉर्ड 14.58% पर था।

वैसे, एनपीए घटने का एक प्रमुख कारण कर्ज को राइट ऑफ करना है। सरकार की तरफ से संसद में दी जानकारी के अनुसार वित्त वर्ष 2014-15 से 2023-24 तक बैंकों ने 12.3 लाख करोड़ के कर्ज राइट ऑफ किए। इनमें से 6.5 लाख करोड़ के कर्ज सरकारी बैंकों ने पिछले 5 वर्षों में राइट ऑफ किए हैं। आरबीआई के मुताबिक बीते 5 वर्षों के दौरान राइट ऑफ किए गए कर्ज में से सिर्फ 18.7% की रिकवरी हुई। यानी 81.3% कर्ज की रिकवरी नहीं हो पाई है और यह रकम 8 लाख करोड़ रुपये के आसपास है।

मौजूदा वित्त वर्ष की पहली छमाही में सरकारी बैंकों को 86 हजार करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ हुआ है। वित्त वर्ष 2023-24 में सरकारी बैंकों को रिकॉर्ड 1.41 लाख करोड़ रुपये का मुनाफा हुआ, जो एक साल पहले 1.05 लाख करोड़ था।
घर हुए 32% महंगे तो बिक्री सिर्फ 2% बढ़ी

प्रॉपर्टी कंसल्टेंट फर्म सीबीआरई के भारत, दक्षिण-पूर्व एशिया, मध्य पूर्व और अफ्रीका क्षेत्र के चेयरमैन तथा सीईओ अंशुमन मैगजीन के मुताबिक, “वर्ष 2024 रियल एस्टेट सेक्टर के लिए रिकॉर्ड तोड़ने वाला रहा। इस वर्ष रिकॉर्ड ऑफिस लीजिंग हुई। आवासीय इकाइयों की बिक्री और लांचिंग भी एक दशक में सबसे अधिक रही। साल के पहले नौ महीने में रियल एस्टेट में 8.9 अरब डॉलर का इक्विटी निवेश हुआ, जो अब तक का रिकॉर्ड और पिछले साल से 46% अधिक है।”

इस वर्ष जनवरी से सितंबर तक रिकॉर्ड 5.33 करोड़ वर्ग फुट स्पेस लीज पर ली गई। इस दौरान 3.62 करोड़ वर्ग फुट ऑफिस स्पेस की सप्लाई भी हुई। सबसे अधिक मांग ग्लोबल कैपेसिटी सेंटर (जीसीसी) की तरफ से रही, जिन्होंने 38% जगह लीज पर ली। पूरे साल में ऑफिस स्पेस लीजिंग 7 करोड़ वर्ग फुट को पार कर जाने की उम्मीद है। हालांकि रिटेल दुकानों में जगह की मांग इतनी उत्साहजनक नहीं है।

कुछ ऐसी ही स्थिति आवासीय क्षेत्र में भी है। प्रॉपर्टी कंसल्टेंट एनारॉक ग्रुप के चेयरमैन अनुज पुरी ने बताया कि आवासीय इकाइयों की नई लांचिंग 2024 के पहले नौ महीने में 2023 की तुलना में 2% कम रही। शायद इसका कारण आम चुनाव और कई राज्यों में विधानसभा चुनाव थे। जनवरी से सितंबर तक सात बड़े शहरों में 3.58 लाख यूनिट घरों की बिक्री हुई, जो पिछले साल से सिर्फ 2% अधिक है। दिसंबर तिमाही में बिक्री पिछले साल से कम रहने के आसार हैं। घरों के दाम में औसतन 32% वृद्धि हुई, जो बीते पांच वर्षों में सबसे अधिक है।

पुरी के अनुसार, 2025 में कीमतों में स्थिरता आने की उम्मीद है। लागत और मांग बढ़ने के कारण दाम तो बढ़ेंगे, लेकिन 2024 जितने नहीं। चुनावों की वजह से जो प्रोजेक्ट धीमे हुए थे, उनमें तेजी आने से सप्लाई भी बढ़ेगी। रिजर्व बैंक की तरफ से भी ब्याज दरें घटाए जाने की उम्मीद है, जिससे खरीदारों के लिए कर्ज सस्ता होगा।
विदेशी निवेश 45% बढ़ा

वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के उद्योग संवर्धन और आंतरिक व्यापार विभाग (DPIIT) के अनुसार मौजूदा वित्त वर्ष में अप्रैल से सितंबर तक इक्विटी एफडीआई 45% बढ़ा है। पिछले साल के 20.48 अरब डॉलर की तुलना में इस वर्ष 29.79 अरब डॉलर का एफडीआई आया है। एफडीआई के लिहाज से सर्विसेज, कंप्यूटर हार्डवेयर एवं सॉफ्टवेयर, ट्रेडिंग, रिन्यूएबल एनर्जी, इन्फ्रास्ट्रक्चर, ऑटोमोबाइल, केमिकल, टेलीकॉम, फार्मा और कंस्ट्रक्शन शीर्ष 10 सेक्टर हैं। इक्विटी में पुनर्निवेश और अन्य निवेश को शामिल करें तो पहली छमाही में 42.10 अरब डॉलर का एफडीआई आया है। वर्ष 2021-22 में अब तक का सबसे अधिक 84.83 अरब डॉलर का विदेशी निवेश हुआ था।

एसबीआई के अनुसार, ट्रंप 1.0 के दौरान भारत को अमेरिका से केवल 11 अरब डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) प्राप्त हुआ। ओबामा 2.0 के दौरान यह 7 अरब डॉलर था, जबकि बाइडेन (2020-24) के कार्यकाल में अमेरिका से भारत में 35.3 अरब डॉलर का FDI आया। इसका कहना है कि भारत अब FDI के लिए पारंपरिक स्रोतों पर निर्भर नहीं है। अब FDI गैर-पारंपरिक ऊर्जा, समुद्री परिवहन, मेडिकल और सर्जिकल उपकरण जैसे नए क्षेत्रों में आ रहा है। यह ट्रेंड आगे भी जारी रह सकता है। ऐसे 12 उभरते क्षेत्रों में निवेश की संभावना है।
मांग घटने से कच्चा तेल सस्ता

भारत और चीन के अलावा एशिया के अन्य देशों, अफ्रीका और मध्य पूर्व में विकास दर में गिरावट को देखते हुए ओपेक ने वर्ष 2024 और 2025 के लिए कच्चे तेल के उत्पादन अनुमान में लगातार पांचवें महीने कटौती की है। उसने कहा है कि इस वर्ष वैश्विक मांग 16.1 लाख बैरल प्रतिदिन बढ़ने की उम्मीद है। पिछले महीने उसने 18.2 लाख बैरल और जुलाई में 22.5 लाख बैरल की उम्मीद जताई थी। यह अब तक की सबसे बड़ी कटौती भी है। वर्ष 2025 के लिए इसने मांग में प्रतिदिन 14.5 लाख बैरल वृद्धि का अनुमान जताया है। पहले इसने 15.4 लाख बैरल का अनुमान व्यक्त किया था।

चीन कच्चे तेल का सबसे बड़ा आयातक है और ओपेक को लगता है कि इस साल वहां इसकी मांग 4.3 लाख बैरल प्रतिदिन बढ़ेगी। जुलाई में इसने 7.6 लाख बैरल का अनुमान व्यक्त किया था। इसका एक बड़ा कारण चीन में इलेक्ट्रिक वाहनों की बढ़ती संख्या है। मांग में कमी का असर दाम पर भी हुआ है। अप्रैल में ब्रेंट क्रूड 90 डॉलर प्रति बैरल के आसपास था, जो इस साल का सबसे अधिक भाव है। इस समय इसका रेट 73 डॉलर के करीब है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल आयात करता है।
आठ माह में निर्यात सिर्फ 2% बढ़ा

मौजूदा वित्त वर्ष में अप्रैल से नवंबर तक वस्तु निर्यात 284.31 अरब डॉलर का हुआ यह अप्रैल-नवंबर 2023 के 278.26 अरब डॉलर से 2.17% अधिक है। इस दौरान आयात 449.24 अरब डॉलर से 8.34% बढ़कर 486.73 अरब डॉलर हो गया। सर्विसेज के निर्यात में 14.47% और आयात में 14.18% वृद्धि हुई। कुल सेवा निर्यात 251.94 अरब डॉलर का रहा। इस तरह वस्तु और सेवा मिलाकर कुल निर्यात 7.6% बढ़कर 536.25 अरब डॉलर का रहा, जबकि आयात 9.54% बढ़कर 619.20 अरब डॉलर हो गया।

निर्यातकों के संगठन फियो के सीईओ और डीजी अजय सहाय कहते हैं, “वर्ष 2024 बहुत चुनौती भरा रहा। वैश्विक परिस्थितियों के कारण माल ढुलाई का खर्च यानी फ्रेट भी बहुत अधिक रहा। पहले शिपिंग रेट बढ़ा, उसके बाद विमानों से माल ढुलाई बढ़ी तो उसकी दरों में भी काफी वृद्धि हो गई। जो कंपनियां निर्यात बढ़ाने में सफल रही हैं, उनकी प्रॉफिटेबिलिटी बहुत घट गई है। यह बिजनेस के लिहाज से अच्छा संकेत नहीं है।”

हालांकि 2025 में उन्हें हालात कुछ बेहतर होने की उम्मीद है, “रूस-यूक्रेन युद्ध में कुछ सकारात्मक डेवलपमेंट के आसार बन रहे हैं। दूसरे युद्ध की बात करें तो ईरान कमजोर हुआ है और ट्रंप के आने पर जिस तरह की मदद इजरायल को मिलने की संभावना है, उससे युद्ध की इंटेंसिटी कम होने की संभावना बन रही है।”

“लेकिन ट्रंप के आने से अनिश्चितता भी बढ़ेगी। उनकी अमेरिका फर्स्ट और टैरिफ बढ़ाने की नीति के जवाब में दूसरे देश भी टैरिफ लगा सकते हैं। इससे विश्व स्तर पर चुनौती पूर्ण स्थिति बनी रहेगी। राजनीतिक स्तर पर सुधार की उम्मीद तो है लेकिन आर्थिक स्तर पर अभी कुछ स्पष्ट नहीं है। ट्रंप का आना भारत के रणनीतिक संबंधों के लिए अच्छा हो सकता है। लेकिन ट्रेड के लिए यह कितना अच्छा होगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि हमारे प्रतिस्पर्धी देशों पर और हम पर किस तरह का टैरिफ लगता है। इसलिए मौजूदा स्थिति काफी अनिश्चितता वाली है।”
घरेलू और निर्यात मांग का असर मैन्युफैक्चरिंग पर

जीडीपी आंकड़ों के मुतािक दूसरी तिमाही में मैन्युफैक्चरिंग ग्रोथ 7% से घटकर 2.2% पर आ गई। पिछले साल की दूसरी तिमाही और इस साल की पहली तिमाही, दोनों की तुलना में मैन्युफैक्चरिंग और कंस्ट्रक्शन की ग्रोथ (7.7%) रेट कम हुई है। सर्विसेज में 7.1% ग्रोथ पहली तिमाही के 7.2% से कम है। पहली छमाही में मैन्युफैक्चरिंग विकास दर 9.6% के मुकाबले 4.5% और कंस्ट्रक्शन की 11% की तुलना में 9.1% रह गई। सर्विसेज में 8.3% के मुकाबले 7.1% ग्रोथ है।

सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय की तरफ से जारी आईआईपी आंकड़ों के अनुसार, इस वित्त वर्ष में अप्रैल से अक्टूबर तक मैन्युफैक्चरिंग 3.8% और बिजली उत्पादन 5.4% बढ़ा है। फूड प्रोडक्ट, लेदर गुड्स, कागज, फार्मा प्रोडक्ट में इस दौरान निगेटिव ग्रोथ रही है। फर्नीचर, बिजली के उपकरण, ट्रांसपोर्ट उपकरण, अपैरल जैसे सेगमेंट में उत्पादन अच्छा बढ़ा है।

टियर 2 और टियर 3 शहर बन रहे रिक्रूटमेंट हब

रिक्रूटमेंट सर्विसेज फर्म टीमलीज के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर पी. सुब्बुरत्नम के अनुसार, “वर्ष 2024 में डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन, ग्रीन एनर्जी, ऑनलाइन शॉपिंग और वित्तीय समावेशन के कारण बैंकिंग-फाइनेंस-बीमा, ई-कॉमर्स, ऊर्जा और लॉजिस्टिक्स में हायरिंग में अच्छी वृद्धि देखने को मिली। गिग-जॉब्स ने इसमें अहम भूमिका निभाई। एक महत्वपूर्ण ट्रेंड यह रहा कि टियर 2 और टियर 3 शहर प्रमुख रिक्रूटमेंट हब बन कर उभर रहे हैं। नियोक्ता एंट्री-लेवल भूमिका पर भी फोकस कर रहे हैं। उनके लिए स्किल-आधारित आकलन और कम अवधि के प्रशिक्षण कार्यक्रम जैसी पहल की जा रही हैं।”

थिंक टैंक सीएमआईई के अनुसार मौजूदा वित्त वर्ष के पहले आठ महीने में से पांच महीने बेरोजगारी दर 8% या उससे अधिक रही है। अप्रैल से नवंबर तक औसत बेरोजगारी दर 8.1% रही। पिछले साल भी यह दर इतनी ही थी।

सुब्बूरत्नम का सुझाव है कि जो युवा उच्च शिक्षित नहीं हैं, वे व्यावहारिक और मांग वाली स्किल हासिल कर अपनी एंप्लॉयबिलिटी बढ़ा सकते हैं। मसलन, डिजिटल लिटरेसी और कम्युनिकेशन स्किल लगभग हर क्षेत्र में जरूरी हो गई है। टेक्निकल भूमिका में भी सेक्टर विशेष के मुताबिक स्किल हासिल कर एंट्री-लेवल जॉब हासिल की जा सकती है। जैसे, रिन्यूएबल एनर्जी प्रोजेक्ट में उपकरणों की हैंडलिंग की जानकारी।

नौकरियों के लिहाज से एक और महत्वपूर्ण बात है कि तेजी से बढ़ते मैन्युफैक्चरिंग और इन्फ्रास्ट्रक्चर जैसे सेक्टर प्रतिभा की कमी से जूझ रहे हैं। इनमें कुशल प्रोफेशनल की डिमांड की तुलना में उपलब्धता बहुत कम है। जैसे, टेलीकॉम नेटवर्क के विस्तार में फाइबर टेक्नीशियन और फील्ड सर्विस इंजीनियरों की काफी मांग है, लेकिन इनमें स्किल्ड लोग बहुत कम हैं।
क्या करे भारत

प्रो. अरुण कुमार कहते हैं, “ट्रंप के आने से डी-ग्लोबलाइजेशन बढ़ सकता है। जब तक ट्रंप पदभार ग्रहण नहीं करते और यह स्पष्ट नहीं हो जाता कि वह क्या करने वाले हैं तब तक हम भी अनिश्चितता में होंगे। इसलिए सरकार और रिजर्व बैंक को सावधानी से कदम बढ़ाना चाहिए। वैसे भी इस मामले में हमारे करने से कुछ नहीं होगा, ट्रंप जो करेंगे उससे असर पड़ेगा।”

“अगर डी-ग्लोबलाइजेशन होता है तो हमें घरेलू ताकत पर निर्भर रहना पड़ेगा। घरेलू क्षेत्र तभी मजबूत होगा जब हमारा असंगठित क्षेत्र बेहतर होगा। उसमें मांग बढ़ेगी तो संगठित क्षेत्र भी ठीक से चलेगा। इसलिए सरकार को असंगठित क्षेत्र को साथ लेने की नीति अपनानी चाहिए। जीएसटी से भारत का माइक्रो सेक्टर, जो ज्यादातर असंगठित है, काफी प्रभावित हुआ है। लास्ट पॉइंट टैक्स होने के बावजूद यह हर चरण में लगता है। अगर एक जगह टैक्स लिया जाए तो बीच की चेन में शामिल असंगठित क्षेत्र को सहूलियत होगी।”

सीआईआई की बिदिशा के अनुसार, मजबूत घरेलू मांग और पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार के कारण भारत अभी तक विपरीत परिस्थितियों और बाहरी झटकों से निपटने में सफल रहा है। लेकिन जिस तरह वैश्विक व्यवधान लगातार बने हुए हैं, उन्हें देखते हुए घरेलू मांग बढ़ाने के प्रयास की जरूरत है। प्रोडक्टिव रोजगार का सृजन, स्किल की कमी दूर करने, बेहतर पूंजी निर्माण, इनोवेशन और आरएंडडी पर अधिक फोकस जैसे उपाय इसमें मददगार हो सकते हैं।

वे कहती हैं, “भू-राजनीतिक विवाद, ट्रेड फ्रैगमेंटेशन, सप्लाई चेन में व्यवधान, लगातार ऊंची महंगाई और नीतिगत अनिश्चितता भारत के लिए बड़ी चुनौतियां हैं। ज्यादातर बाहरी कारक हमारे नियंत्रण से बाहर हैं और निकट भविष्य में ऐसा ही रहने का अंदेशा है। इस अनिश्चितता से निकलने की क्षमता मध्यम और लंबी अवधि में भारत के विकास की दिशा तय करेगी।”

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