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Thursday, December 26, 2024

Jobs: 2024 के जॉब ट्रेंड के साथ जानिए अगले साल कहां होंगी अधिक संभावनाएं, कहां मांग से कम है प्रोफेशनल्स की उपलब्धता

 Jobs: 2024 के जॉब ट्रेंड के साथ जानिए अगले साल कहां होंगी अधिक संभावनाएं, कहां मांग से कम है प्रोफेशनल्स की उपलब्धता






Jobs: 2024 के जॉब ट्रेंड के साथ जानिए अगले साल कहां होंगी अधिक संभावनाएं, कहां मांग से कम है प्रोफेशनल्स की उपलब्धता

टियर 2 और टियर 3 शहरों में भर्तियां बढ़ने की दर महानगरों से तेज है। इस वर्ष बैंकिंग फाइनेंशियल सर्विसेज और बीमा (BFSI) ई-कॉमर्स एनर्जी और लॉजिस्टिक्स जैसे सेक्टर में नौकरियां बढ़ीं। आगे इनके साथ आईटी रिटेल और टेलीकॉम जैसे सेक्टर में ज्यादा भर्तियां होने की संभावना है। आईटी में मशीन लर्निंग इंजीनियर बिग डेटा टेस्टिंग इंजीनियर डेटा साइंस एनालिस्ट फुल स्टैक डेटा साइंटिस्ट जैसे क्षेत्रों में मांग अधिक है।


नौकरियों के लिहाज से साल 2024 की शुरुआत सुस्त रही थी, लेकिन उसके बाद तिमाही-दर-तिमाही इसमें तेजी आती रही। पहले तीन महीने में एक साल पहले की तुलना में 10% कम भर्तियां हुई थीं, लेकिन अब पूरे साल में भर्तियां पिछले साल से 10% अधिक रहने का अनुमान है। माना जा रहा है कि यह मोमेंटम 2025 में भी जारी रहेगा। खास बात यह है कि टियर 2 और टियर 3 शहरों में भर्तियां बढ़ने की दर महानगरों से तेज है। इस लेख में वर्ष 2024 के जॉब ट्रेंड के साथ हम आपको बताएंगे कि अगले साल कहां अधिक संभावनाएं हैं और एंट्री लेवल पर कहां मौके हैं। साथ ही, वे कौन से सेक्टर हैं जहां जरूरत के मुताबिक प्रोफेशनल्स की उपलब्धता कम है।

इस वर्ष बैंकिंग, फाइनेंशियल सर्विसेज और बीमा (BFSI), ई-कॉमर्स, एनर्जी और लॉजिस्टिक्स जैसे सेक्टर में नौकरियां बढ़ीं। आगे इनके साथ आईटी, रिटेल और टेलीकॉम जैसे सेक्टर में ज्यादा भर्तियां होने की संभावना है। आईटी में मशीन लर्निंग इंजीनियर, बिग डेटा टेस्टिंग इंजीनियर, डेटा साइंस एनालिस्ट, फुल स्टैक डेटा साइंटिस्ट जैसे क्षेत्रों में मांग अधिक है। हालांकि इस खुशनुमा तस्वीर के साथ एक तथ्य यह भी है कि अन-एंप्लॉयमेंट यानी बेरोजगारी की जगह अब अंडर-एंप्लॉयमेंट यानी कम-रोजगारी बड़ी चुनौती बनती जा रही है। काम करने वालों का सबसे बड़ा तबका असंगठित क्षेत्र में ही है और सरकारी आंकड़ों के मुताबिक नियमित वेतन पाने वाले 22% भी नहीं हैं।

2024 में नौकरियों का ट्रेंड

रिक्रूटमेंट सर्विसेज फर्म टीमलीज के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर पी. सुब्बुरत्नम ने जागरण प्राइम को बताया, “टेक्नोलॉजी में प्रगति और वर्कफोर्स के बदलते डायनामिक्स के कारण जॉब मार्केट में भी निरंतर बदलाव हो रहे हैं। वर्ष 2024 में BFSI, ई-कॉमर्स, एनर्जी और लॉजिस्टिक्स जैसे सेक्टर में ज्यादा लोगों को जॉब्स मिले। इसकी वजह डिजिटाइजेशन, ग्रीन एनर्जी, ऑनलाइन शॉपिंग और फाइनेंशियल इनक्लूजन पर बढ़ता जोर है। डिजिटल बैंकिंग, डिलीवरी सर्विसेज और वेयरहाउसिंग जैसे क्षेत्रों में एंट्री लेवल की भर्तियां हुई हैं। इनके लिए कम्युनिकेशन स्किल और बेसिक डिजिटल टूल्स की जानकारी होनी चाहिए।”

जॉब पोर्टल नौकरी के अनुसार इस वर्ष पहली तिमाही में भर्तियां 10% कम हुईं। दूसरी तिमाही में हालात कुछ बेहतर हुए और तीसरी तिमाही में अच्छी ग्रोथ देखने को मिली। एफएमसीजी सेक्टर में पहली तिमाही में भर्तियां सुस्त रहने के बाद तेजी आई और तीसरी तिमाही में 20% की ग्रोथ हुई। फार्मा और बायोटेक में सेल्स तथा मार्केटिंग मैनेजर की मांग अधिक है। कमोबेश यही ट्रेंड बीएफएसआई में भी दिखा।

जॉब प्लेटफॉर्म फाउंडइन के अनुसार मौजूदा वर्ष में हायरिंग 10% बढ़ी है। यह गति 2025 में जारी रहेगी और हायरिंग 9% बढ़ने की उम्मीद है। ज्यादा भर्तियां आईटी, रिटेल, टेलीकॉम और बीएफएसआई सेक्टर में होंगी। इसका कहना है कि अगले वर्ष उभरती टेक्नोलॉजी और बिजनेस की नई प्राथमिकताएं भारत के जॉब मार्केट को आकार देंगी।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस-मशीन लर्निंग सेक्टर में 47% तक की ग्रोथ से टेक-टैलेंट की मांग का अंदाजा मिलता है। नौकरी के अनुसार, मशीन लर्निंग इंजीनियर, बिग डेटा टेस्टिंग इंजीनियर, डेटा साइंस एनालिस्ट, फुल स्टैक डेटा साइंटिस्ट जैसे क्षेत्रों में मांग अधिक है। इंडस्ट्री में एआई का प्रयोग किस तेजी से बढ़ रहा है, इसका अंदाजा आरबीआई के डिप्टी गवर्नर माइकल देबब्रत पात्रा के एक बयान से मिलता है। पिछले दिनों जयपुर में एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि भारतीय फर्मों की उत्पादन प्रक्रिया में एआई का इंटीग्रेशन 2023 में सिर्फ 8% था, यह बढ़कर 2024 में 25% हो गया है।

देबब्रत ने कहा, “आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी तकनीक उभरती और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को मिडिल इनकप ट्रैप से बाहर निकालने की कुंजी भी मानी जा रही हैं। अनुमान है कि केवल जेनरेटिव एआई अगले तीन वर्षों में विश्व जीडीपी को 7-10 लाख करोड़ डॉलर तक बढ़ा सकता है। अध्ययन बताते हैं कि लार्ज लैंग्वेज मॉडल कामगारों की उत्पादकता 8 से 36 प्रतिशत तक बढ़ाने में सक्षम हैं।”

“अनुमान है कि विश्व जीडीपी में डिजिटल इकोनॉमी 15% से अधिक है। भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था देश की जीडीपी के 10% के आसपास है। पिछले एक दशक में डिजिटल इकोनॉमी जिस तेजी से बढ़ रही है, उसे देखते हुए अनुमान है कि 2026 तक यह जीडीपी के 20% तक पहुंच जाएगी। जेनरेटिव एआई 2029-30 तक भारत की जीडीपी में 359-438 अरब डॉलर का योगदान करेगा।”

छोटे शहर में बढ़ रही हायरिंग

नौकरी के अनुसार महानगरों से बाहर देखें तो इंदौर, उदयपुर, भुबनेश्वर और जयपुर जैसे टियर 2 तथा टियर 3 शहरों में हायरिंग अधिक तेजी से बढ़ रही है। इस साल उदयपुर में नई भर्तियां 17% और इंदौर में 14% बढ़ी हैं। जयपुर टेक्नोलॉजी हब के रूप में उभरा है जहां तीसरी तिमाही में आईटी सेक्टर में हायरिंग 48% बढ़ी।

सुब्बू कहते हैं, “टियर 2 और टियर 3 शहरों में हायरिंग पैटर्न में उल्लेखनीय बदलाव देखने को मिला। ये शहर रिक्रूटमेंट हब के तौर पर उभर रहे हैं। कंपनियां अपना कामकाज इन शहरों में ले जा रही हैं, जिससे डिलीवरी सर्विसेज, ऑपरेशंस एवं मेंटिनेंस, रिटेल बैंकिंग, बैक ऑफिस ऑपरेशंस जैसे सेगमेंट में मौके बन रहे हैं। इस तरह की नौकरियों में एडेप्टेबिलिटी, समस्या समाधान की क्षमता और स्थानीय बाजार की समझ की जरूरत पड़ती है। लोगों को भी अपने घर के आसपास करियर बनाने का मौका मिलता है।”

गिग वर्कर्स की बढ़ती संख्या

सुब्बू के अनुसार, हाल में गिग प्लेटफॉर्म काफी लोकप्रिय हुए हैं। फ्लेक्सिबल होने के कारण लोग थोड़े समय के लिए इसमें काम करने के उद्देश्य से आ रहे हैं। खासतौर से लॉजिस्टिक्स, ग्राहक सेवा और आईटी इनेबल्ड सर्विसेज (ITES) जैसे सेगमेंट में। इस तरह के अवसरों ने एंट्री लेवल कर्मचारियों को मल्टी टास्किंग, ऐप आधारित काम और ऑन-द-जॉब लर्निंग जैसी व्यावहारिक स्किल विकसित करने में मदद की। इस वजह से गिग प्लेटफॉर्म नियोक्ता और कर्मचारी दोनों के लिए आकर्षक विकल्प बन गए हैं।

आने वाले कुछ समय की बात करें तो लॉजिस्टिक्स और कस्टमर सर्विस जैसे सेक्टर में गिग वर्क की प्रधानता रहेगी। यह नियोक्ताओं के लिए कम खर्चीला होता है तो कर्मचारियों को भी इसमें काफी लचीलापन मिलता है। नियोक्ता टीमवर्क, प्रभावी कम्युनिकेशन स्किल और डिजिटल प्लेटफॉर्म को जल्दी अपनाने की योग्यता वालों को रखना पसंद करेंगे। गिग वर्क में लचीलेपन के कारण व्यक्ति को खाली समय में अपने आप को अपग्रेड करने अवसर भी मिलता है। स्किल डेवलपमेंट पर फोकस करके गिग वर्कर अपने आप को ज्यादा स्पेशलाइज्ड और कुशल भूमिकाओं के लिए तैयार कर सकते हैं। इससे न सिर्फ उन्हें आय का साधन मिलता है, बल्कि करियर बनाने में भी सहूलियत होती है। जाहिर है कि गिग वर्क में लंबे समय तक रहना करियर के लिए ठीक नहीं।
इन कार्यों में एंट्री लेवल पर मौके

फाइनेंशियल सर्विसेज के विस्तार और रेगुलेशन में सख्ती के कारण बीएफएसआई सेक्टर में कंप्लायंस सपोर्ट, फाइनेंशियल ऑपरेशंस, कलेक्शन, डेटा मैनेजमेंट जैसे क्षेत्रों में नए ग्रेजुएट के लिए अवसर बढ़ेंगे। इनमें रेगुलेटरी प्रक्रियाओं का पालन कराने, डेटा हैंडलिंग और कस्टमर की मदद जैसे बुनियादी स्किल की जरूरत पड़ती है। ग्रीन फाइनेंस, रिन्यूएबल एनर्जी और दूरसंचार के विस्तार से प्रोजेक्ट सपोर्ट, इंस्टॉलेशन, ऑपरेशंस और कस्टमर सर्विस जैसे कार्यों के लिए एंट्री लेवल जॉब की संभावनाएं बढ़ेंगी।

सुब्बू कहते हैं, “इन क्षेत्रों में बढ़ते बिजनेस को देखते हुए नियोक्ता भी एंट्री लेवल की भूमिकाओं के लिए हायरिंग को स्ट्रीमलाइन करने का प्रयास कर रहे हैं। वर्कफोर्स के लिए स्किल आधारित एसेसमेंट और कम अवधि के प्रशिक्षण देने जैसी पहल की जा रही हैं। इसके लिए कंपनियां स्टाफिंग पार्टनर के साथ साझेदारी भी कर रही हैं। विशेष कौशल सीखने से नियोक्ता और कर्मचारी दोनों को फायदा होता है, कर्मचारियों की प्रोडक्टिविटी बढ़ती है।”

कम स्किल वाले एम्पलॉयबिलिटी बढ़ाएं

जो युवा उच्च शिक्षित नहीं है, उन्हें ऐसी स्किल हासिल करने पर फोकस करना चाहिए जिनकी डिमांड है। इससे उनकी एम्पलॉयबिलिटी बढ़ेगी। ज्यादातर सेक्टर में डिजिटल साक्षरता मौलिक जरूरत बन गई है। इसमें स्मार्टफोन, एप्लीकेशन और ऑनलाइन टूल का प्रयोग शामिल हैं। ई-कॉमर्स, कस्टमर सर्विस और लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों में इस तरह की भूमिकाएं अधिक हैं। खास तौर से जो लोग ग्राहकों के साथ बात, सेल्स और सपोर्ट जैसी पोजीशन में काम करना चाहते हैं उनके लिए कम्युनिकेशन स्किल भी समान रूप से महत्वपूर्ण है।

सुब्बू सुझाव देते हैं, “टेक्निकल भूमिकाओं में सेक्टर विशेष के मुताबिक स्किल हासिल करना फायदेमंद होगा। जैसे बीएफएसआई सेक्टर में एंट्री लेवल जॉब के लिए फाइनेंशियल प्रक्रिया की जानकारी हासिल करना, टेलीकॉम में इंस्टॉलेशन और समस्या समाधान जानना और रिन्यूएबल एनर्जी में उपकरणों की हैंडलिंग के तरीका जानना जरूरी है। आज के समय में टीमवर्क, कोलैबोरेशन और नई स्किल हासिल करने की लगन भी काफी मायने रखती है।”
इन सेक्टर में उपलब्धता से अधिक मांग

सुब्बूरत्ननम के मुताबिक कई ऐसे सेक्टर हैं जिनमें स्किल्ड प्रोफेशनल की काफी डिमांड है। मैन्युफैक्चरिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर का तेजी से विस्तार हो रहा है और ऐसे प्रोजेक्ट में जटिलताएं भी काफी होती हैं। लेकिन इन सेक्टर को पर्याप्त संख्या में कुशल लोग नहीं मिल रहे हैं। स्किल्ड प्रोफेशनल की मांग उनकी उपलब्धता से काफी ज्यादा है। लोगों को व्यावसायिक शिक्षा के जरिए इस लायक बनाया जा सकता है। समय के साथ ये स्किल्ड प्रोफेशनल ज्यादा बड़ी भूमिकाओं में आ सकते हैं, जो उनके करियर को आगे ले जाने में मदद करेगा। इस तरह की अपस्किलिंग से मेंटिनेंस, ऑपरेशंस और प्रोजेक्ट एग्जीक्यूशन जैसे कार्यों में करियर के अवसर बन सकते हैं।

टेलीकॉम नेटवर्क के तेजी से हो रहे विस्तार के कारण फाइबर टेक्नीशियन, एनओसी विशेषज्ञ और फील्ड सर्विस इंजीनियरों की काफी मांग है, लेकिन उनकी जानकारी रखने वाले प्रोफेशनल बहुत कम हैं। इसी तरह ग्रीन और रिन्यूएबल एनर्जी क्षेत्र में प्रोजेक्ट इंप्लीमेंटेशन और प्रशासनिक कार्यों के लिए लोगों की आवश्यकता है। इनमें भी विशेषज्ञता रखने वाले कम लोग ही उपलब्ध हैं।

बीएफएसआई सेक्टर में भी सेल्स, कलेक्शन और कस्टमर रिलेशनशिप भूमिका में लोगों की कमी है। हेल्थकेयर और डायग्नोस्टिक सेक्टर में प्रशिक्षित लैब टेकनीशियन और को-ऑर्डिनेटर की जरूरत है। लॉजिस्टिक्स और सप्लाई चेन सेक्टर स्किल्ड वेयरहाउस स्टाफ की कमी से जूझ रहा है। ई-कॉमर्स में डिलीवरी के स्तर पर लोगों की कमी है। रुचि के मुताबिक इन क्षेत्र में कौशल हासिल करके युवा अपनी एम्पलॉयबिलिटी बढ़ा सकते हैं।
बेरोजगारी और अंडर-एंप्लॉयमेंट की समस्या

थिंकटैंक CMIE का कहना है कि देश में बेरोजगारी दर 8% है, जबकि सरकारी आंकड़ों के मुताबिक यह सिर्फ 3.2% है। युवाओं में बेरोजगारी दर भी वैश्विक औसत से कम है। बेरोजगारी दर कम होने के बावजूद कम-रोजगारी या अंडर-एंप्लॉयमेंट बहुत ज्यादा है।

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के अनुसार, विकासशील देशों के लिए सामान्य बेरोजगारी दर सटीक पैमाना नहीं है। क्योंकि बहुत कम लोग लंबे समय तक बिना काम के रह सकते हैं। कामकाजी उम्र के ज्यादातर लोगों को आजीविका के लिए कोई न कोई काम करना ही पड़ता है, भले ही उनकी आमदनी कम हो। यही कारण है कि भारत में बेरोजगारी दर ऐतिहासिक रूप से कम है। सही स्थिति जानने के लिए बेरोजगारी के साथ कम-रोजगारी दर को भी देखना चाहिए।

कम-रोजगारी दर 2012 में 8.1% थी, यह 2019 में बढ़कर 9.1% हो गई, और फिर 2022 में घटकर 7.5% पर आई। वर्ष 2022 में कम-रोजगारी पुरुषों में 7.7% और महिलाओं में 7.1% थी। शहरों में यह 8.4% तो गांवों में 7.2% थी।

लेबर स्टैटिसटिशियन के 16वें अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में तय परिभाषा में कम-रोजगारी के तीन मानक रखे गए हैं- अतिरिक्त घंटे काम करने की इच्छा, अतिरिक्त घंटे काम करने के लिए उपलब्धता और सरकार द्वारा निर्धारित काम के घंटे से कम समय के लिए काम करना।

देश की लगभग 65% आबादी 35 साल से कम उम्र की और 27% लोग 15-29 साल के हैं। इनमें ज्यादातर स्वरोजगार में हैं जहां आमदनी बहुत कम होती है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के अनुसार 15 साल से अधिक उम्र के लोगों में स्वरोजगार वालों का अनुपात 2022 में 67.7% था जो 2023 में 71% हो गया। सिर्फ 15-29 आयु वर्ग को देखें तो उनमें यह अनुपात 69.3% से बढ़कर 73.8% हुआ है।

पीएलएफएस 2023-24 के मुताबिक 2023-24 में स्वरोजगार वाले 58.4% और कैजुअल 19.8% थे। नियमित वेतन वाले सिर्फ 21.7% थे। यह अनुपात 2021-22 में क्रमशः 55.8%, 22.7% और 21.5% था। वर्ष 2022-23 में इनकी संख्या क्रमशः 57.3%, 21.8% और 20.9% थी। अर्थात स्वरोजगार वालों का अनुपात बढ़ रहा है और नियमित वेतन वाले लगभग स्थिर हैं।

स्वरोजगार वालों की आमदनी भी कम होती है। अप्रैल-जून 2024 में नियमित वेतन वालों की औसत मासिक आय 21,103 रुपये थी। तुलनात्मक रूप से देखें तो स्वरोजगार वालों ने इस दौरान महीने में औसतन 13,900 रुपये कमाए थे। नियमित वेतन वालों में 58% के पास कोई जॉब कॉन्ट्रैक्ट नहीं है, 47.3% को पेड छुट्टी नहीं मिलती और 53.4% किसी भी सामाजिक सुरक्षा के हकदार नहीं हैं।

दरअसल, कामकाजी वर्ग में अधिकांश लोग असंगठित क्षेत्र में हैं। अन-इनकॉरपोरेटेड सेक्टर के उपक्रमों के सालाना सर्वेक्षण (ASUSE) के अनुसार सितंबर 2024 तक ऐसे उपक्रमों में कुल 12.06 करोड़ लोग काम कर रहे थे। एक साल पहले इनकी संख्या 10.96 करोड़ थी। साल भर में सेवा क्षेत्र के उपक्रमों में काम करने वाले 17.9%, मैन्युफैक्चरिंग में 10% और ट्रेड में 1.9% बढ़ी। इस दौरान इन उपक्रमों की संख्या 6.51 करोड़ से 12.7% बढ़ कर 7.34 करोड़ हो गई। अन-इनकॉरपोरेटेड उपक्रम उन गैर-कृषि इकाइयों को कहा जाता है जो कंपनी कानून 1956 या कंपनी कानून 2013 के तहत रजिस्टर्ड नहीं हैं।

ऐसे में रोजगार बढ़ाने के लिए सरकार के स्तर पर भी खर्च बढ़ाने की जरूरत है। जेएनयू के प्रोफेसर (रिटायर्ड) और अर्थशास्त्री अरुण कुमार कहते हैं, “राजकोषीय घाटा बढ़ने पर सरकार पहले स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे सामाजिक क्षेत्र पर खर्च में कटौती करती है, जबकि इनमें ही ज्यादा रोजगार पैदा हो सकता है। घाटा बढ़ने पर पूंजी सघन क्षेत्र पर खर्च नहीं घटाया जाता, जबकि उनमें रोजगार कम पैदा होता है। उदाहरण के लिए, पहले सड़क बनने पर सैकड़ों लोग काम करते थे, अब बड़ी-बड़ी मशीनें काम करती हैं। रोजगार के लिए तो हमें ग्रामीण विकास, कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों पर ही निर्भर करना पड़ेगा।”

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