एशेज सीरीज के शुरू होने से पहले इंग्लैंड के कप्तान बेन स्टोक्स (Ben Stokes) ने कहा था कि वह ऑस्ट्रेलिया में एशेज जीतने वाले इंग्लैंड के कप्तान की लिस्ट में शामिल होने के लिए बेताब हैं। ऐसा ही एक वादा साल 1882 में तत्कालीन इंग्लैंड कप्तान इवो ब्लीग ने किया था, जब उन्होंने कहा कि वह एशेज को ऑस्ट्रेलिया से वापस लाएंगे।

एशेज सीरीज- इवो ब्लीग और फ्लोरेंस मर्फी की प्रेम कहानी।
Ivo Bligh and Florence Morphy Ashes Love Story: दुनिया की सबसे पुरानी टेस्ट सीरीज 'द एशेज' में इन दिनों चिर-प्रतिद्वंद्वी ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड आमने-सामने हैं। एशेज सीरीज के शुरू होने से पहले इंग्लैंड के कप्तान बेन स्टोक्स (Ben Stokes) ने कहा था कि वह ऑस्ट्रेलिया में एशेज जीतने वाले इंग्लैंड के कप्तान की लिस्ट में शामिल होने के लिए बेताब हैं।
ऐसा ही एक वादा साल 1882 में तत्कालीन इंग्लैंड कप्तान इवो ब्लीग (Ivo Bligh) ने किया था, जब ऑस्ट्रेलिया ने ओवल में इंग्लैंड को हराकर उनका घमंड तोड़ा था। टीम की हार के बाद इंग्लैंड में खूब शोर मचा। 'द स्पोर्टिंग टाइम्स' अखबार ने तो इसे इंग्लिश क्रिकेट की 'मौत' का नाम दे दिया।
एक मजाक बना हकीकत
साथ ही दुख जताते हुए एक नकली शोक संदेश भी छाप दिया। इस संदेश में लिखा था; 'शव का अंतिम संस्कार कर दिया गया है बची हुई राख ऑस्ट्रेलिया ले जाई जाएगी।' तब इंग्लैंड कप्तान इवो ब्लीग ने कसम खाई कि वो ऑस्ट्रेलिया से एशेज वापस लाएंगे। यहीं, कहानी ने मोड़ ले लिया। वह ऑस्ट्रेलिया से न सिर्फ एशेज लेकर आए, बल्कि अपनी दुल्हन भी साथ ले आए।
इवो ब्लीग एक ब्रिटिश अमीर आदमी के बेटे थे। जब इंग्लिश क्रिकेट की 'मौत' वाला नकली शोक संदेश उन्होंने पढ़ा तो उसी साल की सर्दियों में ऑस्ट्रेलिया टूर का इंतजाम करने में जुट गए। इवो ब्लीग ने मेलबर्न क्रिकेट क्लब को एक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने ऑस्ट्रेलिया के दौरे पर जाने की इच्छा जताई।
पहली नजर में हुआ प्यार
ब्लीग के पत्र का जवाब देते हुए मेलबर्न क्रिकेट क्लब ने उनके प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। ब्लीग की इस साहसिक यात्रा ने ना सिर्फ क्रिकेट के इतिहास को बदला, बल्कि उनकी निजी जिंदगी को भी पूरी तरह से बदल दिया। ब्लीग ने ऑस्ट्रेलिया जाने के लिए टीम बनाई और क्रिकेटरों का पहला बैच शिप से रवाना हुआ। इस बैच में ब्लीग खुद मौजूद थे।
शिप के यात्रियों में मेलबर्न क्रिकेट क्लब के प्रेसिडेंट सर विलियम क्लार्क और उनकी दूसरी पत्नी जेनेट भी मौजूद थीं। ब्लीग और जेनेट बहुत जल्दी दोस्त बन गए, हालांकि वह उनसे उम्र में बहुत बड़ी थीं। मेलबर्न पहुंचे तो क्लार्क ने उनके रहने का इंतजाम अपने घर रूपर्ट्सवुड में ही किया। उस घर में 19 साल की एक बड़ी खूबसूरत गवर्नेस फ्लोरेंस मर्फी (Florence Morphy) थी।
आयरिश मूल की ये लड़की बीचवर्थ के एक गोल्ड कमिश्नर और पुलिस मजिस्ट्रेट की सातवीं और सबसे छोटी संतान थीं। ब्लीग को उनसे पहली नजर में ही प्यार हो गया और उसके बाद तो उनकी पूरी कोशिश रहती थी कि वह उनके आस-पास ही रहें।
टेस्ट मैच के दौरान किया प्रपोज
ब्लीग और उनकी टीम 30 दिसंबर, 1882 को पहले टेस्ट के लिए वार्मअप कर रहे थे। इस मैच के दौरान इवो ब्लीग के शरीर पर लगने वाले हर घाव पर जेनेट और फ्लोरेंस पर मरहम लगाए। इस दौरान जेनेट को एहसास हुआ कि ब्लीग और फ्लोरेंस एक दूसरे को पसंद करने लगे हैं।
जेनेट इस पर कोई आपत्ति नहीं थी पर वे दोनों के स्टेटस के फर्क से डरती थीं। जेनेट ने तो ब्लीग को ये भी चेतावनी दी कि अगर वे सिर्फ मर्फी के सुंदर चेहरे पर फिदा हैं तो इस किस्से को यहीं भूल जाएं। हालांकि, ब्लीग ने कुछ और ही ठान रखी थी। इंग्लैंड के कप्तान ब्लीग ने 1883 के नए साल की पूर्व संध्या पर फ्लोरेंस को प्रपोज किया और तब मेलबर्न में टेस्ट मैच चल रहा था।
वह टेस्ट मैच के दौरान शादी का प्रस्ताव रखने वाले इंग्लैंड के पहले और संभवतः आखिरी कप्तान बने। टेस्ट सीरीज शुरू होने से पहले 3 जनवरी 1883 को ब्लीग ने अपने माता-पिता को एक लेटर लिखा जिसमें उन्होंने फ्लोरेंस मर्फी से शादी करने की बात कही।
इसके बाद टेस्ट सीरीज शुरू हुई। मेलबर्न टेस्ट मैच में इंग्लैंड ने पारी और 27 रन से जीत दर्ज की। इसके बाद सीरीज का दूसरा टेस्ट मैच सिडनी में खेला गया। इंग्लैंड ने 69 रन से जीत दर्जकर सीरीज पर कब्जा जमा लिया। जीत के बाद यादगार के रूप में ब्लीग को मैच में इस्तेमाल की गई दो बेल्स दी गई।
गिफ्ट में मिला कलश
सिडनी टेस्ट जीतने के बाद ब्लीग को रूपर्ट्सवुड (Rupertswood) मेंशन में जेनेट ने एक गिफ्ट दिया। जेनेट ने यूरोप यात्रा के दौरान इटली में काजल रखने के लिए एक टेराकोटा कलश खरीदा था, इसे उन्होंने ब्लीग को गिफ्ट कर दिया। हालांकि, ब्लीग को राख वापस ले जानी थी तो इस कलश में राख रखने का इंतेजाम किया जाने लगा।
फ्लोरेंस उस एशेज से बड़ी नजदीक से जुड़ी थीं। उनके अनुसार, एशेज के उस कलश में असल में एक स्कार्फ की राख है। मेलबर्न में तेज हवाएं कि वहज से महिलाएं शिफॉन स्कार्फ पहनती थीं, जब सिडनी टेस्ट में जीत के बाद ब्लीग को एशेज गिफ्ट करना था तो जल्दबाजी में उनके ही दो स्कार्फ को जला दिया और अवॉर्ड सेरेमनी के लिए एशेज तैयार की थी।
हालांकि, कलश में किस चीज की राख है यह आज तक स्पष्ट नहीं हो पाया है। ब्लीग परिवार के अपने नोट्स के मुताबिक इंग्लैंड की सिडनी में 69 रन से जीत के बाद जब ब्लीग रूपर्ट्सवुड मेंशन लौटे तो साथ में टेस्ट में इस्तेमाल दो बेल्स भी लाए थे। इनमें से एक बेल को पेन होल्डर में बदल दिया था और ये लॉर्ड्स म्यूजियम में एशेज के कलश के बगल में रखा है।
ऐसा कहा जाता है कि दूसरी बेल्स को जलाकर उसकी राख को कलश में रखा गया था। MCC ने कभी एशेज कलश में मौजूद राख की साइंटिफिक एनालिसिस की इजाजत नहीं दी। वैसे 1998 में ब्लीग के बेटे की की पत्नी ने ये दावा किया कि कलश में रखी एशेज किसी बेल की नहीं, उनकी सास के स्कार्फ की है।
मर्फी को मिला डेम ऑफ द ब्रिटिश एम्पायर का टाइटल
खैर, कहानी पर वापस आते हैं। सीरीज के बाद ब्लीग इंग्लैंड लौट आए। अपने माता-पिता से फ्लोरेंस से शादी की मंजूरी ली और जल्दी ही फिर से ऑस्ट्रेलिया चले गए। वहां क्लार्क परिवार ने ही शादी का सारा इंतजाम किया और सनबरी के सेंट मैरी चर्च में दोनों की शादी हो गई।
इवो ब्लीग ने ना सिर्फ एशेज, बल्कि ऑस्ट्रेलिया से अपनी दुल्हन भी घर लाए। फ्लोरेंस रोज मर्फी इस तरह उस इंग्लिश क्रिकेटर का दिल जीतने के बाद मिसेज इवो ब्लीग बन गईं। समय के साथ फ्लोरेंस सोसाइटी में अपने पति से आगे निकल गईं। एक शौकिया पेंटर के तौर पर नाम बनाया। बाद में एक कामयाब रोमांटिक नॉवेलिस्ट बनीं।
उधर, इवो 1900 में डार्नेल के 8वें अर्ल बने। पहले वर्ल्ड वॉर के दौरान इस जोड़े ने अपने घर 'कोबहम हॉल' को घायल ऑस्ट्रेलियाई सैनिकों के इलाज के लिए एक अस्पताल में बदल दिया। 1919 में, वॉर में ऐसे ही योगदान के सम्मान में फ्लोरेंस को डेम ऑफ द ब्रिटिश एम्पायर का टाइटल मिला। इसके बाद वह 'काउंटेस ऑफ डार्नेल' के नाम प्रसिद्ध हुईं।
इवो ब्लीग की अप्रैल 1927 में 68 साल की उम्र में नींद में ही मौत हो गई। उनकी मौत के बाद फ्लोरेंस ने एशेज वाला वह कलश एमसीसी को सौंप दिया। तब से वह वहीं म्यूजियम में रखा गया है। एशेज सीरीज जीतने वाली टीम को इसकी रिप्लिका दी जाती है।
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