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Friday, December 12, 2025

भारत को सुपरपावर ग्रुप में ले आएंगे ट्रंप? क्या है अमेरिका का नया 'कोर-5' प्लान

 भारत को सुपरपावर ग्रुप में ले आएंगे ट्रंप? क्या है अमेरिका का नया 'कोर-5' प्लान



अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप एक नए 'कोर-5' ग्रुप की योजना बना रहे हैं, जिसमें अमेरिका, भारत, चीन, रूस और जापान शामिल होंगे। इसका मुख्य उद्देश्य जी- ...और पढ़ें




भारत को सुपरपावर ग्रुप में ले आएंगे ट्रंप? (फाइल फोटो)


अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप एक नए 'कोर-5' (हार्ड-पावर समूह) ग्रुप की योजना बना रहे हैं। जिसमें अमेरिका, भारत, चीन, रूस और जापान शामिल होंगे। इसका मुख्य उद्देश्य उन प्रमुख शक्तियों का एक नया निकाय बनाना है, जो मौजूदा यूरोप-प्रभुत्व वाले जी-7 और अन्य पारंपरिक लोकतंत्र और धन-आधारित समूहों को दरकिनार कर देगा।


हालांकि, इसको लेकर अभी तक कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, व्हाइट हाउस ने दस्तावेज के अस्तित्व से इनकार किया है। लेकिन अमेरिकी प्रकाशन पॉलिटिको ने बताया कि नए हार्ड-पावर समूह का विचार राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति के एक लंबे, अप्रकाशित संस्करण में सामने आया था, जिसे व्हाइट हाउस ने पिछले सप्ताह प्रकाशित किया था।


क्या है अमेरिका का नया 'कोर-5' प्लान

एनडीटीबी की खबरों के मुताबिक, 'रणनीति में 'कोर फाइव' या C-5 का प्रस्ताव है, जिसमें संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन, रूस, भारत और जापान शामिल हैं। इनमें से कई देशों की आबादी 10 करोड़ से अधिक है। इस समूह में जी-7 की तरह नियमित रूप से विशिष्ट विषयों पर शिखर सम्मेलन आयोजित किया जाएगा। प्रस्तावित C-5 एजेंडा में पहला विषय मध्य पूर्व में सुरक्षा, विशेष रूप से इजरायल और सऊदी अरब के बीच संबंधों का सामान्यीकरण है।'

ट्रंपवादी झलक

पॉलिटिको के अनुसार, व्हाइट हाउस ने इस दस्तावेज के अस्तित्व से इनकार कर दिया है। प्रेस सचिव हन्ना केली ने कहा है कि 33 पृष्ठों की आधिकारिक योजना का 'कोई वैकल्पिक, निजी या गुप्त संस्करण' मौजूद नहीं है।हालांकि, राष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस विचार में "ट्रंपवादी" झलक मिलती है।


बता दें कि यह रिपोर्ट ऐसे वक्त पर आई है, जब अमेरिका में पहले से ही इस बात को लेकर बहस चल रही है कि ट्रंप प्रशासन का दूसरा कार्यकाल विश्व व्यवस्था में कितना बड़ा बदलाव लाने का इरादा रखता है। यह विचार जी-7 और जी-20 जैसे मौजूदा वैश्विक मंचों को बहुध्रुवीय दुनिया के लिए अपर्याप्त मानता है और प्रमुख जनसंख्या और सैन्य-आर्थिक शक्तियों के बीच समझौते करने को प्राथमिकता देता है।

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