नई दिल्ली: राजनीति श्रेय लेने का कारोबार है. जवाबदेही के वक़्त कोई नज़र नहीं आता. एक दौर था जब पेट्रोल के दाम कुछ कम भी हुए मगर कच्चे तेल की अन्तरराष्ट्रीय क़ीमतों के अनुपात में नहीं. 40 डॉलर प्रति बैरल पर भी लोगों से उतना ही वसूला गया जितना 100 डॉलर प्रति बैरल पर लिया जाता था. मगर बीच-बीच में कुछ पैसे की कमी और कभी-कभी 1 से 2 रुपये की कमी भी हुई है, जिसका ढिंढोरा पीटा गया.
तब दिल्ली में विधानसभा चुनाव हो रहे थे. कर्नाटक चुनाव के कारण उन्नीस दिनों तक दाम नहीं बढ़ा. चुनाव ख़त्म होते ही तीन दिनों से लगातार दाम बढ़े हैं. कभी पंद्रह पैसे तो कभी पचीस पैसे के हिसाब से. कल दिल्ली में एक लीटर पेट्रोल का दाम 75.06 रुपये प्रति लीटर था. शायद पाँच साल में सबसे अधिक. वैसे जनता को इससे फ़र्क़ नहीं पड़ रहा है फिर भी सरकार ऐसे पोस्टर तो लगा ही सकती थी. मुंबई के लोग तो एक लीटर के लिए 82 रुपये से अधिक दे रहे हैं.
तब दिल्ली में विधानसभा चुनाव हो रहे थे. कर्नाटक चुनाव के कारण उन्नीस दिनों तक दाम नहीं बढ़ा. चुनाव ख़त्म होते ही तीन दिनों से लगातार दाम बढ़े हैं. कभी पंद्रह पैसे तो कभी पचीस पैसे के हिसाब से. कल दिल्ली में एक लीटर पेट्रोल का दाम 75.06 रुपये प्रति लीटर था. शायद पाँच साल में सबसे अधिक. वैसे जनता को इससे फ़र्क़ नहीं पड़ रहा है फिर भी सरकार ऐसे पोस्टर तो लगा ही सकती थी. मुंबई के लोग तो एक लीटर के लिए 82 रुपये से अधिक दे रहे हैं.
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